
दक्षिण भारत तीर्थस्थानों से भरा पड़ा है | इसी कारण कभी कभी साउथ इंडिया की रेलवे को तीर्थयात्रा की रेलवे कहा जाता है | यहाँ के सैकड़ो स्थानों में रामेश्वरम और मदुरै का स्थान सर्वोच्च है | यहाँ के मन्दिर अत्यंत प्राचीन काल के बने हुए है और इनका इतिहास भी सदियों पुराना है | ये इतने विशाल और कला की दृष्टि से उच्चकोटि के है कि मनुष्य इन्हें देखकर ठगा सा रह जाता है | उत्तरी भारत में ऐसा कोई प्राचीन मन्दिर नही है जिसमे इन मन्दिरों की तुलना की जा सके |
तिरुचुरापल्ली-तूतीकोरिन लाइन पर तिरुचिरापल्ली से लगभग 165 किमी के फासले पर मदुरै नगर है | जो यात्री रामेश्वरम यात्रा करके मदुरै आते है उन्हें रामेश्वरम-रामबाद से आगे मानामदुरै जंक्शन पर ट्रेन बदलनी पडती है | मानामदुरै से मदुरै तक रेल आती है | मानामदुरै से मदुरै की दूरी 50 किमी है | यह नगर वेगा नदी के किनारे है | संस्कृत ग्रंथो में इसका नामा मधुरा मिलता है | इस दक्षिण मथुरा भी कहा गया है |
कहा जाता है कि पहले यहाँ कदम्ब का वन था | कदम्ब के एक वृक्ष के नीचे भगवान सुन्दरेश्वर का स्वयम्भूलिंग था | देवता उसकी पूजा करते थे | श्रुधालू पांड्य नरेश मलयध्वज को इसका पता लगा | उन्होंने उस लिंगमूर्ति के स्थान पर मन्दिर बनवाने तथा वही नगर बसाने का संकल्प किया | स्वप्न में भगवान शंकर ने राजा के संकल्प की प्रशंशा की और दिन में एक सर्प के रूप में स्वयं आकर नगर की सीमा का निर्देश कर गये |
पांड्य नरेश के कोई सन्तान नही थी | मलयध्वज ने अपनी पत्नी कंचनमाला के साथ सन्तानप्राप्ति के लिए दीर्घकाल तक तपस्या के | राजा की तपस्या और आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और आश्वासन दिया कि उनके एक कन्या होगी | साक्षात भगवती पार्वती ही अपने अंश से राजा मलयध्वज के यहाँ कन्या के रूप में अवतीर्ण हुयी | उनके विशाल सुंदर नेत्रों के कारण माता-पिता ने उनका नाम मीनाक्षी रखा | राजा मलयध्वज कुछ काल पश्चात कैलाशवासी हो गये | राज्य का भार रानी कांचनमाला ने सम्भाला | मीनाक्षी के युवती होने पर साक्षात् भगवान सुन्दरेश्वर ने उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की | रानी कांचनमाला ने बड़े समारोह से मीनाक्षी का विवाह सुन्दरेश्वर शिव से कर दिया |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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