
रणकपुर जैन मन्दिर (Ranakpur Jain Temple) अपनी अद्भुद शिल्पकला के कारण देशभर में विख्यात है | यह दर्शनीय स्थल उत्तरी राजस्थान के हरे भरे क्षेत्र सावडी से 9 किमी दूर अरावली पहाडियों की गोद में प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच अवस्थित है | यह उदयपुर से करीब 137 किमी , जोधपुर से 132 किमी और मारवाड़ जंक्शन एवं अहमदाबाद रेल लाइन फालना स्टेशन से 21 किमी की दूरी पर स्थित है | यहाँ से पहुचने के लिए बसों की समुचित व्यवस्था उपलब्ध रहती है |
अरावली पहाड़ो की शृंखलाओं की गोद में बसा यह पवित्र धार्मिक स्थल जैन सम्प्रदाय का महान तीर्थस्थल है जो गोडवाड के पंचतीर्थो का प्रमुख अंग है | यहाँ हजारो दर्शनार्थी बारहों मॉस आते रहते है | रणकपुर के इस मन्दिर (Ranakpur Jain Temple) का निर्माण महाराणा कुम्भा के मंत्री सेठ धारणाशाह , जो रणकपुर के समीपस्थ गाँव नदिया के निवासी थे , ने करीब 90 लाख स्वर्ण मुहरे खर्च करके बनवाया था |
इस मन्दिर की नींव सन 1446 में पोरवाल वंशीय सेठ धारणाशाह और उनके बड़े भाई रत्नाशाह ने आचार्य सोमसुंदर सूरी के सम्पर्क में आने पर डाली | पचास वर्ष के कठिन परिश्रम से मुंडारा निवासी मस्त मिजाजी और मनमौजी शिल्पी देवा और उनके परिवार के शिल्पियों ने अथक प्रयत्नों से इसका निर्माण किया | चौमुखी मंजिले इस भव्य जिनालय में श्री आदिनाथ भगवान की चौमुखी प्रतिमा वि.स. 1496 में प्राण प्रतिष्टा की गयी | इस मन्दिर का निर्माण कार्य में आचार्य सोमसुंदर सूरी , मंत्री धारणाशाह ,राणा कुम्भा की आज्ञा औरशिल्पी देवा के अथक श्रम आज भी रणकपुर के इस विशाल देवालय बोलते है |
मुख्य मन्दिर का भवन जमीन से 36 सीढियों की ऊँचाई पर तीन मंजिलो में स्थित है जो 48 हजार वर्ग फीट के जमीन के घेरे में 198 फीट की लम्बाई और 105 फीट की चौड़ाई में बना हुआ है | मन्दिर में चार उपभवन , 400 स्तम्भों पर खड़े करीब 86 छोटे गुम्बज है | यहाँ के 20 मंडप पाषाणों पर की गयी सुंदर शिल्पकला के आकर्षण बने हुए है | दुसरी ओर 44 घुमाव है जिनके चक्कर काटने पर भी कलाकृतियों को निहारने पर थकावट का अनुभव नही होता |
मन्दिर में प्रतिष्टित सैकड़ो प्रतिमाये जैन धर्म के आचार-विचार , एतेहासिक घटनाओं , सत्य और अहिंसा के उपदेश का सदैव संकेत करती रहती है | मन्दिर के निर्माताओं , उपदेशको और कलाकारों द्वारा मूर्तियों का निर्माण अद्भुत ढंग से किया गया है | मंडपों की पाषाण कला को देखते आँखे थकती ही नही है | रणकपुर सुंदर और बारीक शिल्पकला का एक अनोखा खजाना है |
रणकपुर का प्रमुख चौमुखी मन्दिर श्री आदेश्वर भगवान का मन्दिर है | इसके अंदर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव की बड़ी मूर्ति विराजमान है इस अभी जो चारो तरफ से एक ही आकार की दिखाई देती है | दर्शन करते ही इन्सान के दिल में धार्मिक विचारो की लहर स्वत: ही दौड़ उठती है | मन्दिर की अद्भुद विशेषता यह है कि इसमें कुल 1444 खम्भे है जिनकी सुंदर बनावट अचम्भित किये बिना नही रहती | मन्दिर में खम्भों की अधिकता होते हुए भी इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि मूल प्रतिमा को किसी भी कोने से निहारा जाए , कोई भी खम्भा बीच में रुकावट पैदा नही करे | और वास्तव में खम्भों के कारण मूर्ति-दर्शन में कोई रुकावट नही आती है इसलिए खम्भों की सही संख्या जानने के लिए कठिन परिश्रम और अधिक समय खर्च करना स्वाभाविक हो जाता है |
मन्दिर में खम्भों की बनावट आकर्षक लगती है | मूल प्रतिमा चित्ताकर्षक बनी हुयी है | इसके अतिरिक्त मंडपो , प्रकोष्टो और परिक्रमाओ की मुर्तिया अधिक आकर्षण का केंद्र बिंदु बनी हुयी है | मन्दिर में श्री पार्श्वनाथ भगवान की नाग-नागिनी की छत्रो से सुशोभित प्रतिमा बारीक शिल्पकला और सुंदर चित्रण के लिए विख्यात है | छतो की सुंदर पाषाण कला देलवाडा की शिल्पकला से होड़ लेती है जबकि जाली और झरोखो पर श्रमिको का श्रम टपक उठता है | मन्दिर की हर दीवार , कोना , छत , पंखा , आला ,पावट छज्जा , कंगुरो पर भी शिल्पकार ने अपनी छेनी और हथोडी की कलात्मक चोट कर पत्थर का रूप बदलने का अथक प्रयत्न किया है |
रणकपुर के इस मुख्य मन्दिर (Ranakpur Jain Temple) के अतिरिक्त पास में ही श्री पार्श्वनाथ का छोटा सा संगमरमर का भी मन्दिर बना हुआ है | इसकी शिल्प कला खजुराहो और कोणार्क के समान लगती है | श्रम की इस स्थायी सम्पति को देखने वाल दर्शक कलाकारों की भावनाओं को मुक्त कंठ से प्रशंशा किये बिना नही रह पाते | इस मन्दिर में मैथुन क्रियाओं के दृश्यों का सुंदर ढंग से प्रदर्शन किया गया है जिसका उद्देश मनुष्य के इस जीवन से घृणा के भाव उत्पन्न करना ही है |
इस मन्दिर के अहाते में छोटा सा श्री नेमिनाथ भगवान की श्यामवर्णी मूर्ति का सुंदर मन्दिर बना हुआ है | कहते है कि इस मन्दिर का निर्माण किसी सेठ-साहूकार से नही अपितु धारणाशाह के द्वारा बनाये मुख्य मंदिरके शिल्पियों ने जैन धर्म को अपनी श्रुद्धा एवं भावना को सादर समर्पित करने के लिए किया गया है | इस सुप्रसिद्ध और दर्शनीय मन्दिर के पास सूर्य मन्दिर बना हुआ है | मन्दिर पर सूर्य भगवान का घोड़ो के रथ पर सवारी का दृश्य चारो ओर देखने को मिलतता है | यह मन्दिर भारत में अपने आकार-प्रकार का अनोखा मन्दिर है |
इस रणकपुर के दर्शन करने आने वाले यात्रियों के ठहरने ,खाने-पीने के बर्तन-बिस्तर आदि के समुचित सुविधाए उपलब्ध कराने का जन-संस्था द्वारा प्रबंध करने का यथासभंव प्रयत्न किया गया है | इस तरह यह जैन-मन्दिर नयनाभिराम है और चित्त को श्रुधाभावना से आन्दित करने वाला है |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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