
बीजापुर (Bijapur) का नाम आते ही इतिहास के पन्ने आँखों के सामने पलटने लगते है चूँकि यह एक एतेहासिक शहर है अत: पर्यटन की दृष्टि से यहाँ देखने को बहुत कुछ है | किले है बाग़-बगीचे है महल है झरने है और आसपास पहाड़ी पर्यटन स्थल है | चालुक्य वंश के शासनकाल में इस जिले का नामकरण बीजापुर (Bijapur) हुआ | इससे पहले इसे विजयापुर के नाम से जानते थे अर्थात विजय का शहर | यही से इस शहर का नाम बीजापुर पड़ा |
13वी सदी में दिल्ली के सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने बीजापुर पर कब्जा किया | यही से मुस्लिम प्रभाव में आया लेकिन बीदर के बहमनी शासको 1348 ई. में बीजापुर अपने अधीन कर लिया | 1481 ई. में बहमनी के सुल्तान मुहम्मद खां तृतीय ने युसूफ आदिल खां को बीजापुर का गर्वनर नियुक्त किया | 1489 ई. में आदिल खा ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित किया और आदिलशाही वंश की स्थापना की |
कर्नाटक का बीजापुर (Bijapur) जिला कलाप्रेमियो के लिए आकर्षण का केंद्र है | आदिलशाही वंश के दौरान बीजापुर की भवन स्थापत्य कला उन्नति के चरम पर थी | बीजापुर (Bijapur) में उत्कृष्ट स्थापत्य शैली में बनी 50 मस्जिदे और 20 मकबरे पर्यटकों को आकर्षित करते है | इन स्थापत्य शिल्पों के निर्माण में बेरोजगार हिन्दू शिल्प कारीगरों को रोजगार मिला जबकि इससे पहले तक दक्कन के मुस्लिम शासक पर्सियन शिल्पकारो को इस कार्य के लिए तैनात करते थे |
बीजापुर (Bijapur) के दर्शनीय स्थल
असर महल – 1646 ई. में मुहम्मद शाह द्वारा बनवाया गया असर महल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है | इस महल के हॉल की दीवारों पर प्राकृतिक दृश्यों को जिस सुंदर ढंग से उकेरा गया है और जो नक्काशी की गयी है | वह कलाप्रेमियो को अपनी ओर खींचता है | यहाँ पर विशेषकर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है |
गोल गुम्बद – आदिलशाही वंश के 7वे शासक मुहम्मद आदिलशाह द्वारा बनवाया गया यह गोल गुम्बद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गुम्बद है जिसे उसने अपने जीवनकाल में ही बनवा लिया था | 51 मीटर ऊँचे और 37 मीटर व्यास के बने और 1700 वर्गमीटर क्षेत्र में फैले इस एतेहासिक गुम्बद की दीवारे 3 मीटर मोटी है | गुम्बद का अंदरुनी भाग बिना किसी आधार के है जिसे देखकर आश्चय होता है |
गोल गुम्बद के निर्माण का यह एक बेमिसाल उदाहरण ही है कि घड़ी की टिक-टिक और पेपर की हल्की सरसराहट भी 37 मीटर दूर गैलरी से सूनी जा सकती है | यहाँ पर आवाज ग्यारह गुना ज्यादा अधिक गूंजती है | इस मकबरे में बने अष्टकोणीय कंगूरे स्थापत्य कला की दृष्टि से बेहद आकर्षक है | गुम्बद के उपर पहुचकर सारे शहर का नजारा किया जा सकता है | गुम्बद के आगे की इमारत को संग्रहालय में बदल दिया गया है |
जामी मस्जिद – 1557 ई. से 1686 ई. के मध्य बनी जामी मस्जिद शहर से 1 किमी की दूरी पर स्थित है | इसे जुम्मा मस्जिद कहा जाता है | 10,810 वर्गमीटर क्षेत्रफल में बनी यह विश्व की पहली विशाल मस्जिद थी | मस्जिद का मुख्य भाग पश्चिम की ओर खड़ा है जिसका अग्र भाग 9 मेहराबो से सुसज्जित है | ये मेहराबे गहराई में अंदर की ओर जाते हुए 5 रह जाती है | यह आलीशान मस्जिद धरातल से छत की ओर बढती हुयी किसी फूल की पंखुड़ी के आकार की सी लगती है | चित्रहीन मस्जिद वास्तुशिल्प की दृष्टि से बेहद साधारण मानी जाती है जहां स्वर्ण अक्षरों में लिखी कुरान की एक अनमोल प्रति रखी है |
मुहतार महल – महतार महल जुम्मा मस्जिद तक पहुचने का एक प्रवेश द्वार है जो हिन्दू-मुस्लिम वास्तुशिल्प का एक श्रेष्ठतम उदारहण है | यहाँ Balcony को सहायता देने वाले Bracket पर हिन्दू शिल्प की उच्च चोटी की नक्काशी पर्यटकों को आकर्षित करती है |
ताज बावड़ी – शहर से डेढ़ किमी के दूरी पर बनी विशाल बावड़ी बीजापुर के शासक इब्राहिम द्वितीय की बेगम ताज सुल्ताना की याद में बनवाई गयी थी | बावड़ी के आगे की ओर दो अष्टकोणीय मीनारे बनी हुयी है | मीनारों के पूर्व ओर पश्चिम भाग मिलकर एक विशाल आरामघर बनाते है |
इब्राहिम रोजा – यह इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय की कब्रगाह है | इसके बगीचे को वही रूप दिया गया है जो कि मदीना में पैगम्बर मुहम्मद साहब के मकबरे के चारो ओर बने बगीचों को | यहाँ की इमारतो का निर्माण बेहद नपे-तुले अंदाज में किया गया है | अपने खुबसुरत इमारतो , गुम्बद एवं मेहराबो के कारण ही सम्भवत इसे आगरा के ताजमहल का प्रेरणास्त्रोत माना गया है |
मालिक-ए-मैदान – शहर से डेढ़ किमी की दूरी पर दुनिया की सबसे बड़ी तोप रखी गयी है जिसे बीजापुर की शान भी कहते है | 4.45 मीटर लम्बी , 1.5 मीटर व्यास और 55 टन भार वाली इस तोप को देखने के लिए सैलानियों की भीड़ लगी रहती है | इस तोप की खास बात है कि कडकती धुप में भी छूने पर गर्म नही लगती बल्कि हल्के से स्पर्श पर इसमें से घंटी बजने जैसी आवाज आती है | इस तोप की नली का आकार खुले मुंह वाले शेर जैसा है |
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