
त्रेता युग में प्रभु श्रीराम ने दशहरा दिन रावण वध के लिए प्रस्थान किया था | ऐसी मान्यता है कि रामचन्द्र ने रावण पर विजय प्राप्ति के पश्चात इसी दिन उनका वध किया था | इस दिन को इसी कारण विजयादशमी का नाम प्राप्त हुआ | द्वापर युग में अज्ञातवास समाप्त होते ही पांड्वो ने शक्तिपुजन कर शमी के वृक्ष में रखे अपने शस्त्र पुन: हाथो में लिए एवं विराट की गाये चुराने वाली कौरव सेना पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की |
विजयादशमी पर यात्रा करना सबसे शुभ
दशहरा के दिन नवरात्र पर्व का समापन होता है | इस दिन पृथ्वी से माँ दुर्गा अपने लोक के लिए प्रस्थान करती है | यही वजह है कि विजयादशमी को यात्रा तिथि भी कहा गया है | इस दिन किसी भी दिशा में यात्रा करने से कोई दोष नही लगता है |विजयादशमी यु तो सर्वसिद्धि मुहूर्त है | इस दिन अपराजिता पूजन , शमी पूजन ,सीमोलंघन ,घर वापसी ,नारी पूजन ,नये शस्त्र एवं आभूषण धारण करना ,राजाओ द्वारा शस्त्र या सम्पदा का पूजन | राजाओं ,सामन्तो और क्षत्रियो के लिए यह विशेष महत्व का दिन है |
दशहरे का किसानो के लिए महत्व
वैसे देखा जाए तो यह त्यौहार प्राचीन काल से चला आ रहा है |आरम्भ ने यह कृषि सम्बधी लोकोत्सव था |वर्षा ऋतू में बोई गयी धान की पहली फसल जब किसान घर ले आते थे तब यह उत्सव मनाते थे | नवरात्रि की घट स्थापना के दिन कलश के वेदी पर नौ प्रकार के अनाज बोते है एवं दशहरे के दिन अंकुरों को निकालकर देवता को चढाते है | अनेक स्थानों पर अनाज की बालिया तोडकर प्रवेश द्वार पर उसे बन्दनवार के समान बांधते अहि |यह प्रथा भी इस त्यौहार का कृषि संबधी स्वरूप को ही व्यक्त करती है |आगे इसी त्यौहार को धार्मिक स्वरूप दिया गया और यह एक राजकीय स्वरूप का त्यौहार सिद्ध हुआ |
दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को माना जाता है शुभ
“नीलकंठ तुम नीले रहियो ,दूध-भात का भोजन करियो ,हमारी बात राम से कहियो ” | यह उक्ति गाँव गाँव में चर्चित है |इसका अर्थ यही है कि नीलकंठ भगवान का प्रतिनिधि है | दशहरे पर यही कारण है कि उस पक्षी का दर्शन किया जाता है | भगवान शंकर ने विष का पान किया था और वे नीलकंठ कहलाये थे | यह पक्षी नीलकंठ है तो इसलिए इसका दर्शन शुभ माना गया है | नीलकंठ को भारत के किसानो का मित्र भी माना गया है क्योंकि ये अनावश्यक कीड़े मकोडो को खाकर किसान की मदद करता है |
दशहरे पर पान के बीड़े खाने का रिवाज
अक्सर रावण के दहन के पश्चात विजयादशमी पर पान खाने की परम्परा भी है | इसके पीछे लोगो का विश्वास ही मुख्य है | माना जाता है कि इस दिन लोग असत्य पर सत्य की जीत का उत्सव मानते है और बीड़ा खाकर यह बीड़ा उठाते है कि वे हमेशा सत्य के मार्ग पर चलेंगे | इसका कारण यह भी है कि नवरात्र में श्रुधालू नौ दिनों तक उपवास रखते है और दसवे दिन जब वे भोजन शुरू करते है उसके ठीक पाचन में बीड़ा मदद करता है |
अश्मंतक के पत्तो को बांटने का रिवाज
भगवान श्रीराम के पूर्वज अयोध्या के राजा रघु ने विश्वजीत यज्ञ किया | सर्व सम्पति दान कर वे एक पर्णकुटी में रहने लगे | वहा कौत्स नामक एक ब्राह्मण पुत्र आया | उसने राजा रघु को बताया कि उसे अपने गुरु को गुरु दक्षिणा देने के लिए 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की आवश्यकता है | तब राजा रघु कुबेर पर आक्रमण करने के लिए विवश हो गये | कुबेर राजा रघु की शरण में आये तथा उन्होंने अश्म्तकं एवं शमी के वृक्षों पर स्वर्णमुद्राओ की वर्षा की | उनमे से कौत्स ने केवल 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राए ली | जो स्वर्ण मुद्राए कौत्स ने नही ली , वह सर्व राजा रघु ने बाँट दी | तभी से दशहरे के दिन एक दुसरे को सोने के रूप में लोग अश्मंतक के पत्ते देते है |
दशहरे के दिन इष्ट मित्रो को सोना (अश्मंतक के पत्ते के रूप में ) देने की प्रथा महाराष्ट्र में है | इस प्रथा का एतेहासिक महत्व है | मराठा वीर शत्रु के देश पर मुहीम चलाकर उनका प्रदेश लुटकर सोने चांदी की सम्पति घर लाते थे | जब ये विजयी वीर अथवा सिपाही मुहीम से लौटते ,तब उनकी पत्नी और बहन द्वारा द्वार पर उनकी आरती उतारती | फिर परदेस से लुटकर लाइ सम्पति की एक दो मुद्रा वे आरती की थाली में डालते थे | घर लौटने पर लाइ हुयी सम्पति को वे भगवान के समक्ष रखते थे | तदुपरान्त देवता तथा अपने बुजुर्गो को नमस्कार कर उनका आशीर्वाद लेते थे | वर्तमान काल में इस घटना की स्मृति अश्मंतक के पत्तो को सोने के रूप में बांटने के रूप में शेष रह गयी है |
शमी की पत्तिया का महत्व
कथा है कि महर्षि वर्तन्तू का शिष्य था कौत्स | उसकी शिक्षा पुरी होने पर वर्तन्तू ने उससे गुरु दक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राए माँगी | इसका इंतजाम करने के लिए वह महाराज रघु के पास गया | रघु दान हेतु खजाना पहले ही खाली कर चुके थे | उन्होंने कौत्स से तीन दिन का समय माँगा और इंद्र पर आक्रमण का विचार किया | इंद्र ने घबराकर कोषाध्यक्ष कुबेर को रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओ की वर्षा का आदेश दिया |कुबेर ने शमी वृक्ष द्वारा स्वर्ण वर्षा की | जिस दिन यह वर्षा हुयी उसी तिथि को विजयादशमी उत्सव मनाया गया | ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शमी वृक्ष का सम्बध शनि से भी है | शमी वृक्ष का पूजन शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव में सहायक है |
जानिये दशहरे की कुछ खास बाते | Dussehra Facts in Hindi
- दशहरे के दिन भगवान श्रीराम , माता सीता और हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है
- विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है |
- इस दिन रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्त्रोत से शिवजी की आराधना की जाती है |
- इस दिन देश भर में करोड़ो रूपये के फूलो की बिक्री होती है क्योंकि लोग अपने घर के दरवाजे फूलो की मालाओ से सजाकर उत्सव मनाते है |
- इस दिन देश के लोग अपनी अपनी क्षमतानुसार सोना चान्दी , वाहन , कपड़े और बर्तनों की खरीददारी करते है |
- इस दिन देशभर में रावण के पुतले बनाकर जगह जगह जलाए जाते है |
- दशहरे के दिन शहर कस्बो और गाँवों में रामभक्त हनुमान का लंकादहन कार्यक्रम और रामलीला का बखान करते हुए राम रावण युद्ध के साथ रावण दहन किया जाता है |
- इस दिन खासतौर पर गिलकी के पकौड़ी और गुलगुले बनाने का प्रचलन है |
- रावण दहन के बाद एक दुसरे के घर जाकर , गले मिलकर ,चरण छुकर बडो का आशीर्वाद लिया जाता है और साथ ही शमी पत्तो को एक दुसरे को बांटा जाता है | यह पावन त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है |
विजयादशमी से जुडी रोचक परम्पराये
- दशहरा पर्व पर अयोध्या में रामलीलाओं का परम्परागत मंचन होता है | लगभग सभी जगहों पर यह परम्परा किसी न किसी रूप में प्रचलित है | प्राचीन समय में राजा इस दिन विजय अभियान शुरू करते थे | वैश्य समाज इसी दिन नया बहीखाता बनाते है |आज भी ऐसा ही करते है |
- राजस्थान में दशहरा पूजन में मुली , ग्वारफली और चावल चढाने का रिवाज है | दो तांडी (बर्तन) रखी जाती है | एक में रुपया , दुसरी में फल और चावल रखकर ढका जाता है | बाद में हांडी में से वह रुपया निकालकर अलमारी में रखा जाता है | मान्यता है कि वह रुपया वर्ष भर अलमारी को भरा रखेगा |
- काशी-वाराणसी में विजयादशमी पर शस्त्र पूजन , नीलकंठ दर्शन और शमी वृक्ष पूजन की परम्परा है | यह बौद्ध अवतार का दिन भी है इसलिए बुद्ध भगवान की पूजा भी उनके अनुयायी करते है |
- ब्रजक्षेत्र में भी गाँव गाँव में रामलीलाओं का मंचन होता है | यहा “सांझी ” पर्व का समापन भी इसी दिन होता है |
- उत्तरी भारत में इसे प्रायता भी कहते है | इस दिन लौकी का रायता विशेष व्यंजन माना जाता है | पूजन में शास्त्रों का भी पूजन होता है |
- श्री नाथ जी , नाथद्वारा मन्दिर में भी इस दिन प्रभु का सफेद जरी के वस्त्रो ,हीरा ,माणिक्य और मोतियों से विशेष शृंगार होता है | शाम को तिलक के बाद प्रभु को जवारे चढाये जाते है |
- पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में अपराजिता दशमी पर भीतर की आरती सम्पूर्ण होने पर मदनमोहन ,रामकृष्ण तथा माण रधर से दुर्गामाधव का रत्न सिहासन लाकर दशहरा मैदान में ले जाने के लिए वीरवेश धारण कराया जाता है |
- महाकालेश्वर ,उज्जैन में दशहरे के दिन शाम के समय राजाधिराज पालकी में विराजकर शमी पूजा करने आते है |
- बंगाल में इन दिनों दुर्गा पूजन की धूम मची रहती है | बंगाली लोग मूर्ति विसर्जन के बाद सामूहिक रूप से दशहरा पर्व मनाते है |
- राजस्थान में इस अवसर पर रामलीला मंचन , रावण-कुम्भकर्ण एवं मेघनाद के पुतले दहन करने का रिवाह है |
- सिन्धी समाज में दशहरा पर्व पर बच्चो का कुंडन कराने की प्रथा है |
- महाराष्ट्र में इन दिनों दुर्गा पूजा उत्सव की धूम होती है |दशहरे के दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन एवं पकवान पकाकर घरो में पूजन आदि की परम्परा है |
- गुजरात में रामलीला और गरबा नृत्यों के विशेष आयोजन होते है |
- दक्षिण भारत में इन दिनों कोलूं पर्व मनाने की परम्परा अहि | इसमें विशेष सीढ़ी पर खिलौनों को सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाने की परम्परा है |
- तमिलनाडू में इन दिनों आदिशक्ति पूजन की परम्परा है | यहा बच्चों का अक्षराम्भ संस्कार भी इन्ही दिनों कराया जाता है |
- मैसूर में विश्व प्रसिद्ध दशहरा का भव्य जुलुस निकलता है | इसमें हाथी पर महाराजा , विशेष पोशाक में दरबारी , घोड़े ,ऊंट और अपार जनसमूह के साथ साथ मैसूर की प्रगति दिखाने वाली झांकिया शामिल होती है | यहा रावण का पुतला जलाने की परम्परा नही है |
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