संसार की बहुत सी जातियाँ अपनी पुरानी और रुढ़िवादी प्रथाओ को छोडकर नये मार्ग पर अग्रसर हो रही है किन्तु साथ ही ऐसे लोगो की भी कमी नही जो अपने प्राचीन रिवाजो से तनिक भी आगे पीछे नही होना चाहते | इसके अतिरिक्त किसी स्थान की जलवायु का भी वहा के लोगो पर बहुत प्रभाव पड़ता है और वे लोग उसी का अनुसार अपने रहन-सहन तथा प्रथाओं को ढाल लेते है | ग्रीनलैंड और उत्तरी कनाडा के किनारों से मिले हुए भागो में ऐसी ही एक प्राचीन जाति निवास करती है जिसे एस्किमो (Eskimo) कहते है | इतिहासकारों का मत है कि इस जाति के पूर्वज चीनी थे जो इस भाग में आकर बस गये थे | आइये इस जनजाति से जुड़े आपको रोचक तथ्य बताते है
- यहाँ तक अभी आधुनिक सभ्यता का प्रकाश नही पहुचा है और ये लोग आज भी उसी प्रकार का कठोर जीवन व्यतीत कर रहे है जैसा संसार की आदिम जाति किया करती थी |
- इन्हें जीवन की कोई सुविधा नही | इनके पास न तो शरीर गर्म रखने के लिए आग होती है और न उन के लिए भेड़ |
- ये लोग रोटी बनाने के लिए अनाज भी नही उगा सकते और भीषण सर्दी में भी इन्हें बर्फ के मकान बनाकर रहना पड़ता है किन्तु इतनी कठिनाईया होते हुए भी इनमे उत्साह , उमंग और उल्लास की कमी नही | ये हँसते-खेलते अपना जीवन व्यतीत कर देते है |
- यहा के निवासियों के वस्त्र भी बड़े विचित्र होते है | वे प्राय: एक ही तरह की पोशाक पहनते है | उनका मुख्य वस्त्र पजामा और कुर्ता है | ये वस्त्र हिरन और सील की खाल से बनते है |
- यहाँ की स्त्रिया अपने बच्चो को विचित्र ढंग से साथ रखती है | उनके कमर की ओर एक थैली लगी रहती है | इस थैली में वे अपने स्वस्थ और सुंदर बच्चो के लिए घुमती है |
- एस्किमो (Eskimo) बड़े प्रवीण शिकारी है | अत्यधिक ठंड के कारण उस देश में कुछ भी पैदा नही होता , इस कारण अधिकाँश भोजन समुद्र से निकलता है |
- एस्किमो (Eskimo) लोग अपने तीर कमान और भाले व्हेल मछलियों की पसलियों को काटकर बनाते है | ये अपने तीर और भाले इस प्रकार बनाते है जिससे उनके अगले सिरे लगाये और निकाले जा सके | इन सिरों में ये सील मछली की खाल को गुब्बारों के तरह फुला कर बाँध देते है |
- जब एस्किमो (Eskimo) समुद्र में शिकार खेलते है तो निशाना लगाने पर तीर या भाले का सिरा डंडे से अलग होकर शिकार के शरीर में जा घुसता है किन्तु उनमे बंधा गुब्बारा सदा ही उन्हें संकेत करता रहता है कि उनका शिकार कहा है |
- जब उन्हें भोजन की आवश्यकता होती है तो वे उसी संकेत के सहारे शिकार को समुद्र से उठा लेते है | ये गुब्बारे शिकार को पानी की सतह पर ले आने का काम भी करते है |
- इन्ही पुराने शस्त्रों के द्वारा यह जाति व्हेल मछली , सील और वालरस का शिकार खेलती है | ये लोग छोटी चोटी नावे बनाते है इन्हें कायक कहते है |
- पहले लकड़ी या बड़ी मछलियों की हड्डियों को बांधकर नाव का ढांचा बनाया जाता है उसके बाद उस पर सील मछली की खाल चढ़ा दी जाती है |
- हर एस्किमो (Eskimo) के पास उसकी अपनी नाव होती है | वह नाव पर चढी खाल के बीच में एक सुराख बना लेता है और उसमे घुसकर बैठता है | जब वह उसे चलाता है तो उसे छेद के तथा उसके उपर इस प्रकार बरसाती लपेट लेता है कि नाव के अंदर एक बूंद पानी भी नही आ सकता |
- एस्किमो (Eskimo) मछली , चिड़िया , पेड़ की जड़ और जंगली फल खाते है | हिरण और मछली का गोश्त भी इनका भोजन है | इन चीजो के अभाव में उनका जीवित रहना असम्भव है | व्हेल मछली की चर्बी ही उनके घी और इंधन क काम देती है |
- एस्किमो (Eskimo) लोगो की खुराक भी बहुत ज्यादा है | मिलने पर एक एस्किमो एक दिन में दुसरे देशो के व्यक्तियों का एक सप्ताह का भोजन खा जाता है |
- यहाँ के लोग ठंड के कारण कभी स्नान नही कर पाते | कभी कभी माँ अपने बच्चो को जीभ से चाटकर साफ़ कर देती है और यही उनका स्नान है |
- आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि इनके देश में आधी रात के समय भी सूरज निकला रहता है | गर्मी के दिनों में तो हफ्तों सूरज नही डूबता |
- ऐसे मौसम में एस्किमो (Eskimo) हिरण या सील मछली की खाल से बनाये गये डेरो में रहते है लेकिन जाड़ो में जब सूरज के दर्शन ही नही होते , हर स्थान पर सदा बर्फ जमी रहती है और बर्फीली आंधिया चलती रहती है तो ये पत्थर की बनी झोपड़ियो में रहते है |
- ये झोपडिया आधी पृथ्वी में घुसी रहती है | इनमे बहुत घूमकर और पेट के बल रेंगकर पहुचा जा सकता है | बहुत बार झोपडिया बनाने के लिए पत्थर नही मिलते तो ये लोग बर्फ के बड़े बड़े टुकड़े काटकर झोपडिया बनाते है जिसे इग्लू कहते है | इग्लू उन्हें सारे जाड़े सर्दी से बचाती है |
- इग्लू के भीतर आह नही जलाई जाती | ये लोग मछली की चर्बी लैम्पो में जलाते है और उसी पर भोजन पकाते है | इन लैम्पो की लौ झोपड़ियो को इतना गर्म रखती है कि ठंडे से ठंडे दिनों में भी इनमे दम घुटने लगता है |
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